ग्रामीण परिवेश में महिलाओं द्वारा भोजन बनाने के लिये प्रचलित ईंधन एवं इसका उनके जीवन स्तर पर प्रभाव का अध्ययन

 

चंदा देवी1, निर्मला सिंह2

1गृह विज्ञान विभाग, ज्वाला देवी विद्या मंदिर, पी0जी0 कॉलेज, कानपुर (0प्र0), भारत।

2प्रोफेसर, ज्वाला देवी विद्या मंदिर, पी0जी0 कॉलेज, कानपुर (उ0प्र0), भारत।

*Corresponding Author E-mail: patelchanda019@gmail.com

 

ABSTRACT:

भारत के स्वास्थ्य जनसांख्यिकीय में ग्रामीण जन स्वास्थ्य का महत्त्वपूर्ण प्रतिभाग है। सरकारी व गैर सरकारी समुचित प्रयासों के बाद भी इन क्षेत्रों में बीमारी दर में लगातार वृद्धि के सभावित कारणों में ग्रामीण महिलाओं के द्वारा रसोईघर में प्रयोग होने वाले परम्परागत ईंधन (लकड़ी, कोयला, गोबर के कंडे, कैरोसीन, बायो-ईंधन आदि) से होने वाले वायु प्रदूषण भी शामिल हैं। उददेश्यः ग्रामीण अंचलों के घरों में कुकिंग के लिये प्रचलित ईंधन का महिलाओं के कार्यों, आरोग्य तथा स्वास्थ में प्रभाव का अध्ययन करना। शोध विधिः जौनपुर (उत्तर प्रदेश) के चयनित ब्लॉकों से 470 महिलाओं का यादृच्छिक प्रक्रिया द्वारा चयन किया गया। सर्वेक्षण विधि में प्रमाणित प्रश्नावली का प्रयोग किया गया। परिणामः जनसांख्यिकीय अध्ययन में 32.76 प्रतिशत के परिवारों कि संरचना वृहत् पायी गई और 43.61 प्रतिशत महिलाएं इंटरमीडिएट तक शिक्षित पायी गयी। 44.02 प्रतिशत घरों में लिक्विड पेट्रोलियम गैस (एल.पी.जी.) का कनेक्शन तो लिया गया था, परन्तु केवल 12.55 प्रतिशत महिलाओं द्वारा भोजन बनाने में इसका नियमित उपयोग देखा गया। इसमें अधिकांश महिलाओं ने गैस रिफिलिंग न होने के कारण आर्थिक कठिनाई का होना बताया गया। सबसे अधिक प्रचलित ईंधन में (35.74 प्रतिशत) मिट्टी के चूल्हे में लकड़ी का प्रयोग बताया गया। 26.92 प्रतिशत महिलायें श्वास कि समस्या से एवं 13.84 प्रतिशत महिलायें फेफड़े कि बीमारी से ग्रसित पायी गयी। निष्कर्षः प्रदूषण मुक्त ग्रामीण परिवेश में अभी भी घरेलू ईंधन का प्रतिभाग देखा जा रहा है, जिसके कारण महिलाओं के स्वास्थ्य एवं जीवन स्तर पर विपरीत प्रभाव सामने आया है, अतः एल.पी.जी. चूल्हे के प्रयोग से स्वास्थ्य लाभ से सबंधित जागरूकता के साथ उनको इसमें गैस मितव्ययिता कि ट्रेनिंग देना भी आवश्यक है।

 

KEYWORDS: जनसांख्यिकीय, यादृच्छिक, सर्वेक्षण, रूग्णतादर, एल.पी.जी., रसोई गैस, अंगीठी, ग्रामीण

 

 


1. INTRODUCTION:

गरीब एवं पिछडे वर्ग कि महिलाओं को जिनके पास पहले से रसोई गैस कनेक्शन नहीं है, उनको उज्जवला योजना के तहत रसोई गैस कनेक्शन वितरण का कार्य लगातार जारी रहने के बाद गाँवों के घरों में भोजन पकाने के लिये प्रचलित ईंधन कि जांच पड़ताल करना आवश्यक है। जिससे वहाँ के प्रदूषण नियंत्रण तथा जन स्वास्थ्य में इस योजना की भागीदारी कि सार्थकता ज्ञात हो सके। गाँवों में भोजन पकाने कि मुख्य जिम्मेदारी महिलाओं की होती है। अतः घरों में किस ईंधन का प्रयोग करना है यह भी उन्हीं का निर्णय रहता है, किन्तु फिर भी ग्रामीण परिवारों में भोजन पकाने के लिए प्रचलित परम्परागत ईंधन के प्रयोग के कारण सांस और फेफड़ों से सम्बन्धित रोगों के रूग्णतादर में लगातार वृद्धि रिपोर्ट की जा रही है। भारतीय राष्ट्रीय योजना (2001) ने रिपोर्ट तैयार कर जानकारी दी कि 90 प्रतिशत ग्रामीण घरों में लकड़ी, कोयले, कंडो जैसे बायो ईंधन का प्रयोग किया जा रहा है जो सेहत के लिये हानिकारक है। विश्व स्वास्थय संगठन (2018), 8 मई 2018 कि फिट्स रिपोर्ट के अनुसार भारत के करीब 3 मिलियन लोग अभी भी कूकिंग के लिए ठोस बायो-ईंधन का प्रयोग कर रहे हैं। जिसके कारण अस्थमा, सी0ओ0पी0डी0 (COPD), निमोनिया, फेफड़ों का कैंसर, टी0बी0, श्वास व फेफड़ों से सम्बन्धित बीमारियों के रूग्णतादर में कमी नहीं हो सकी है। इन्हीं स्वास्थ्य समस्याओं को कमतर कर गरीब और पिछड़े वर्ग के लोगों के जीवन स्तर को बेहतर बनाने के लक्ष्य से प्रधानमंत्री उज्जवला गैस योजना (प्र.म.उ.यो) यथार्थ में लायी गयी। एन. अहमद एवं अन्य (2018) के विचार से प्र.म.उ.यो. गरीबों के उत्थान हेतु एक बडा कदम है और महिलाओं को श्वसन सबंधित विकारों से बचा कर उनके सशक्तिकरण में योगदान दे सकती है।

 

उचित ईंधन के उपयोग से ही ग्रामीण घरों की महिलाओं एवं परिवारों को अरोग्य और अच्छी सेहत का लाभ मिल सकता है। साथ में महिलाओं के रसोईघर के कार्य कम समय और शक्ति में सम्पादित हो सकते हैं, जिसका सदुपयोग वो रचनात्मक कार्यों द्वारा आर्थिक उपार्जन में लगा सकती हैं।

 

2. शोध विधि एवं सामग्री:

2.1 प्रतिदर्श चयन- कुल 470 प्रतिदर्शों का जौनपुर (उत्तर प्रदेश) के तीन ब्लॉकों के विभिन्न गाँवों से यादृच्छिक विधि से चयन किया गया, जो महिलाएँ शोध में प्रतिभाग देने को सहमत थी।

 

2.2 ऑकड़ों के संकलन हेतु शोध विधि व उपकरण- सर्वेक्षण विधि में संरचित विषय विशेषज्ञों द्वारा प्रमाणित प्रश्नावली का प्रयोग कर प्रतिदर्श महिलाओं का इंटरव्यू लिया गया।

 

2.3 आँकड़ो का विश्लेषण- प्राप्त आँकड़ो का उचित सांख्यिकीय विधियों द्वारा विश्लेषण कर परिणाम ज्ञात किये गये। माध्य, प्रतिशत, काई-वर्ग परीक्षण, सह-सबंध आदि ज्ञात किये गये, इसके लिए माइक्रोसॉफ्ट एक्सल का उपयोग किया गया।

 

3. शोध परिणाम:

3.1 सामाजिक-आर्थिक स्थितियाँ: इसके अन्तर्गत प्राप्त आँकड़ों के विश्लेषण से निम्नलिखित परिणाम ज्ञात हुए:

 

सारणी संख्या 1: महिला प्रतिदर्शी की जनसांख्यिकीय सूचनायें

व्यक्तिगत सूचनाएं

आवृत्ति (N=470)

प्रतिशत (%)

परिवारों में सदस्यों की संख्या

<5

147

31.27

5-7

169

35.95

>7

154

32.76

पारिवारिक सामाजिक-आर्थिक स्थिति (प्रति व्यक्ति आय के आधार पर)

स्तर ग्रेड (प्रति व्यक्ति आय रू0)

I (>8349)

-

0.0

II (4174-8348)

-

0.0

III (2505-4173)

11

2.34

IV (1252-2504)

183

38.93

V (<1251)

276

58.72

महिलाओं का शैक्षिक स्तर

अशिक्षित

14

2.97

माध्यमिक स्कूल शिक्षा

167

35.53

इण्टरमीडिएट

205

43.61

उच्च शिक्षा

84

17.87

 

3.1.1 परिवारों में सदस्यों की संख्या- ज्यादातर महिलाओं (35.95 प्रतिशत) का पारिवारिक स्वरूप 5-7 सदस्यों के साथ मध्यम आकार में पाया गया जबकि 32.76 प्रतिशत का वृहत् परिवार रहा और सबसे कम (31.27) महिलाओं का लघु परिवार रहा।

 

3.1.2 पारिवारिक आर्थिक स्थिति- बी.जी. प्रसाद (वर्ष 2022) के सामाजिक आर्थिक स्केल के (प्रति व्यक्ति आय पारिवारिक आय) अनुसार अधिकांशतः (58.72) ग्रामीण उनके परिवारों के सदस्यों की संख्या का अधिक होना है। मात्र 2.34 प्रतिशत महिलाएं मध्यम वर्ग में आंकी गयी।

 

3.1.3 महिलाओं का शैक्षिक स्तर- अधिकांशः (43.61 प्रतिशत) महिलायें इण्टरमीडिएट कक्षाओं तक शिक्षित पायी गयी और 17.87 प्रतिशत उच्च शिक्षा प्राप्त थी। 2.97 प्रतशित महिलाओं ने स्कूल कभी नहीं गयी।

 

3.2 ग्रामीण घरों में प्रचलित घरेलू ईंधन की स्थिति:

3.2.1 एल.पी.जी. कनेक्शन की स्थिति- सारणी संख्या 2 में यह स्पष्ट है कि ज्यादातर महिलाओं (64.61 प्रतिशत) के घरों में भोजन पकाने के लिए एल.पी.जी. गैस का कनेक्शन नहीं लिया गया था जबकि 44.0.4 प्रतिशत ने कनेक्शन लिया था।

 

सारणी संख्या 2: कूकिंग के लिए एल.पी.जी. कनेक्शन रखने के आधार पर प्रतिदर्शो का वर्गीकरण

एल.पी.जी. का कनेक्शन है

आवृत्ति (N=470)

प्रतिशत (%)

हाँ

207

44.042

नहीं

263

64.61

 

3.2.2 ग्रामीण महिलाओं द्वारा एल.पी.जी. के नियमित प्रयोग की स्थिति- शोध अध्ययन में यह भी ज्ञात किया गया और सारणी संख्या 3 में प्रदर्शित है कि जिन महिलाओं (44.04 प्रतिशत) ने एल.पी.जी. का कनेक्शन लिया हुआ था, उनमें 28.50 प्रतिशत द्वारा नियमित उपयोग खाना बनाने में किया जा रहा था। जबकि अधिकांश महिलाएँ (71.49 प्रतिशत) कभी-कभी इस पर भोजन बनाती थी। गैस रिफिलिंग का मँहगा मिलना, जागरूकता की कमी, दुर्घटना की आशंका आदि इसके मुख्य कारण है।

 

सारणी संख्या 3: भोजन बनाने के लिए एल.पी.जी. के नियमित प्रयोग का स्तर

एल.पी.जी. का नियमित प्रयोग

आवृत्ति (N=207)

प्रतिशत (%)

हाँ

59

28.5

कभी-कभी

148

71.49

 

3.2.3 ग्रामीण घरों में भोजन बनाने के कार्यों में प्रचलित ईंधन- महिलाओं में खाना बनाने के लिये प्रचलिर्त इंधन में सबसे ज्यादा (35.74 प्रतिशत) लकड़ी का प्रयोग मिट्टी के चूल्हे या भट्टियों में किया जा रहा था। वहीं 30 प्रतिशत घासलेट, 20.42 प्रतिशत कोयले का प्रयोग भी ग्रामीण महिलाओं में प्रचलित रहा। जबकि मात्र 12.55 प्रतिशत प्रतिदर्शों द्वारा एल.पी.जी. का नियमित उपयोग किया जा रहा था।

 

सारणी संख्या 4: भोजन बनाने के लिए प्रचलिर्त इंधन के प्रयोग का स्तर

घरेलू ईंधन का प्रयोग

आवृत्ति (N=207)

प्रतिशत (%)

एलपीजी

59

12.55

कोयला (अंगीठी)

96

20.42

लकड़ी (चूल्हा/भट्टी)

168

35.74

घासलेट स्टोव

141

30

हीटर, इंडक्शन या अन्य विद्युत चलित साधन

6

1.27

योग

470

100

 

3.3 महिलाओं में प्रचलित स्वास्थ्य समस्याएँ:

सारणी संख्या 4 में महिला प्रतिदर्शों के स्वास्थ्य का स्तर एवं शारीरिक समस्याओं के प्रचलन का उनके घरों में एल.पी.जी. ईंधन की स्थितियों के बीच सह-संबंधों को प्रदर्शित किया जा रहा है जो इस प्रकार है: क्रोनिक ऑबस्ट्रकटिव पल्मोनरी डिसिसेज (सी.ओ.पी.डी.) एक फेफड़ों से संबंधित हेल्थ प्रोब्लम है, जो एल पी जी का नियमित उपयोग ना करने वाली (25 प्रतिशत) एवं जिनके पास ये गैस कनेक्शन नहीं है उन्हीं महिलाओं (22.43 प्रतिशत) में देखा गया जबकि 11.86 प्रतिशत नियमित कूकिंग गैस में कार्य करने वाली इससे पीड़ित रहीं, जिसका वो इलाज करा रहीं थी। मात्र 3.38 प्रतिशत महिलाओं में लम्बे समय से खाँसी की समस्या पायी गई जो महिलाएं भोजन पकाने के लिए ईंधन के रूप में एल0पी0जी0 का उपयोग करती थी। जबकि ये समस्या 38.78 प्रतिशत और 41.89 प्रतिशत महिलाऐं क्रमशः कनेक्शन नहीं रखने वाले तथा कभी-कभी प्रयोग करने वाले समूहों से पायी गयीं। 15.58 प्रतिशत तथा 18.91 प्रतिशत महिलाएँ क्रमशः कभी-कभी प्रयोग एवं कनेक्शन नहीं वाले समूहों से रही जिनको दमा से सांस फूलने कि शिकायत थी। सारणी में दर्शाए तीनों समूहों में सबसे अधिक (9.12 प्रतिशत) आँखों से पानी आने कि एवं 76.80 प्रतिशत को थकान/कमजोरी कि समस्या ठोस बायो ईंधन पर भोजन बना रही महिलाओं में पाया गयी। महिलाओं में प्रचलित स्वास्थ्य समस्याओं का उनके द्वारा एल पी जी ईंधन के प्रयोग कि स्थितियों से सार्थक सह-संबंध प्राप्त हुआ, काई-वर्ग (X2) सांख्यिकीय विश्लेषण से यह ज्ञात किया गया था।

 

सारणी संख्या 4: ग्रामीण महिलाओं में प्रचलित स्वास्थ्य समस्याओं का एल.पी.जी. ईंधन के प्रयोग की स्थितियों में सह-सम्बन्ध

स्वास्थ्य समस्याएँ

एल.पी.जी. ईंधन के प्रयोग की स्थितियाँ

कुल प्रतिदर्श (N=470)

नियमित उपयोग (N=59)

कभी-कभी (N=148)

नहीं रखतीं (N=263)

सी0ओ0पी0डी0

07 (11.86%)

37 (25.0%)

59 (22.43%)

173 (36.80%)

दीर्घकालीन

02 (3.38%)

62 (41.89%)

102 (38.78%)

166(35.31%)

सांस फूलना/ अस्थमा

6 (10.16%)

28 (18.91%)

41 (15.58%)

75(15.95%)

बार-बार आँखों से पानी आना/ नेत्र संक्रमण

कोई नहीं (0.0%)

13(8.78%)

24(9.12%)

37 (7.87%)

कमजोरी/ थकान

25 (42.37%)

86 (58.10%)

202 (76.80%)

315 (67.02%)

अन्य बीमारियाँ

19 (32.20%)

34(22.97%)

30 (11.40%)

83 (17.65%)

X2 = 24.68

 

4. शोध निष्कर्ष:

इस प्रस्तुत शोध अध्ययन से प्राप्त परिणामों के निष्कर्ष निकाले जा रहे है कि जौनपुर जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी महिलाओं द्वारा घरेलू ईंधन के लिये लकड़ी, कोयले, कंडे जैसे ठोस बायोर्-इंधन या कैरोसीन का प्रयोग बहुतायत से किया जा रहा है। जनसांख्यिकीय तथ्य ये स्पष्ट करते है कि ग्रामीण महिलाओं की उच्च शिक्षा में कमी, बड़ा परिवार, निम्न मध्यम सामाजिक-आर्थिक स्तर जैसे कारण उनमें एल.पी.जी कनेक्शन एवं उसके नियमित उपयोग से सबंधित जागरुकता कि कमी थी और इसलिये निर्णय ना लेकर परम्परागत ईंधनों का उपयोग कर रहीं थी। सिर्फ 28.5 प्रतिशत प्रतिदशों के घरों में नियमित रूप से प्रदूषण रहित घरेलू ईंधन (एल.पी.जी) से कूकिंग कार्य किये जा रहे थे, यही कारण है कि उनमें नेत्रों, श्वसन एवं फेफड़ों से सबंधित हैल्थ प्रोब्लम्स अपेक्षाकृत कम देखी गयी। गाँवों में महिलाओं को एल पी जी के उपयोग से होने वाले समय व शक्ति बचत तथा स्वास्थय लाभों से संबंधित जागरुकता लाने के साथ एल.पी.जी. के उपयोग में मितव्ययिता कर लंबे समय तक चलाने के तरीकों के प्रशिक्षण देना आवश्यक है।

 

5. संदर्भ सूची:

1.    एन अहमद, शर्मा शैलेश एवं सिंह अंजनी, (2018), प्रधानमंत्री उज्जवला योजना (पी.एम.यू.वाई.) सटेप्स टुवर्ड्स शोशल इनक्लूशन इन इंडिया, इंटरनेशनल जरनल ऑफ ट्रेंड्स इन रिसर्च एंड डेवलपमेंट, 2018, वाल्यूम 5 (1)।

2.    भारतीय राष्ट्रीय योजना (2001), प्रदूषण फैलाने वाले घरेलू ईंधन का स्वास्थ्य पर प्रभाव।

3.    डब्ल्यू एच.ओ. (2006), असेसिंग हाउस होल्ड सालिड फ्यूल यूज इन एनवायरमेंट हेल्थ प्रासपेकटिव।

4.    डब्ल्यू.एच.ओ. (2009), पब्लिक हैल्थ एंड एनवायरमेंट, विश्व स्वास्थय संगठन, जिनेवा सम्मिट।

5.    डब्ल्यू एच ओ (2018), फैक्ट शीट 8 मई 2018.

6.    जनसत्ता (जनवरी 19), 2019, उज्जवला योजना का सफलता परलगा सवालिया निशान।

7.    दैनिक भास्कर सर्वे रिपोर्टर (2018), गैर कनेक्शन वाली महिलाओं पर सर्वे रिपोर्ट।

 

 

Received on 12.09.2025      Revised on 15.10.2025

Accepted on 05.11.2025      Published on 14.11.2025

Available online from November 25, 2025

Int. J. of Reviews and Res. in Social Sci. 2025; 13(4):215-218.

DOI: 10.52711/2454-2687.2025.00031

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